न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा |
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा || 3||
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय: |
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी || 4||
न-नहीं; रूपम्-रूप; अस्य-इसकी; इह-इस संसार में; तथा–जैसे की; उपलभ्यते-बोध किया जा सकता है; न कभी नहीं; अन्तः-अन्त; न कभी नहीं; च-भी; आदिः-प्रारम्भ; न कभी नहीं; च-भी; सम्प्रतिष्ठा–आधार; अश्वत्थम्-पवित्र बरगद वृक्ष का; एनम्-इस; सु-विरूढ मूलम्-गहरी जड़ों वाले; असङ्ग-शस्त्रेण विरक्ति के शस्त्र से; दृढेन-दृढ; छित्वा-काट देना चाहिए; ततः-तब; तत्-उस; परिमार्गितव्यम्-खोजना चाहिए; यस्मिन्-जहाँ; गताः-जाकर; न-कभी नहीं; निवर्तन्ति–वापस आते हैं; भूयः-पुनः; तम्-उसको; एव–निश्चय ही; च-भी; आद्यम्-मूल; पुरुषम्-परम प्रभुः प्रपद्ये-शरणागत होना; यतः-जिससे; प्रवृत्तिः-गतिविधि; प्रसृता–प्रवाह; पुराणी-अनादिकाल।
BG 15.3-4: इस संसार में इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का बोध नहीं हो सकता और न ही इसके आदि, अंत और अस्तित्व को जाना जा सकता है। अतः इस गहन जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को विरक्ति रूपी शस्त्र से काट देना चाहिए। तभी कोई इसके आधार को जान सकता है। वह आधार परम प्रभु हैं जिनसे ब्रह्माण्ड का अनादिकाल से प्रवाह हुआ है और उनकी शरण ग्रहण करने पर फिर कोई इस संसार में लौट कर नहीं आता।
देहधारी जीवात्माएँ 'संसार' में डूबी रहती हैं अर्थात् निरंतर जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमती रहती हैं और इस अश्वत्थ वृक्ष की प्रकृति को समझने में असमर्थ रहती हैं। वे इस वृक्ष की कोंपलों को अति आकर्षक समझती हैं अर्थात् वे इन्द्रिय विषयों का भोग करने के लिए लालायित रहती हैं और इनके भोग की कामना को विकसित करती हैं। इन कामनाओं की पूर्ति के लिए वे कठोर परिश्रम करती हैं किंतु उनके प्रयास इस वृक्ष को और अधिक विकसित करते हैं। जब कामनाओं की तृप्ति की जाती है तब वे लोभ के रूप में दोगुनी गति से पुनः उदित होती हैं। जब इनकी पूर्ति में बाधा आती है तब वे क्रोध का कारण बनती हैं, जिससे बुद्धि भ्रमित हो जाती है तथा अज्ञानता गहन हो जाती है।
श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि अश्वत्थ वृक्ष के रहस्य को केवल कुछ लोग ही समझ पाते हैं। सामान्य लौह कहते हैं-“मैं राम प्रसाद का सुपुत्र हरि प्रसाद इत्यादि हूँ और अमुक देश के नगर में निवास करता हूँ। मैं अधिक से अधिक सुख प्राप्त करना चाहता हूँ। इसलिए मैं अपनी शारीरिक चेतना के अनुसार काम करता हूँ किन्तु मुझे धोखे में रखा गया और मैं अब व्यथित हो गया हूँ।" वृक्ष की उत्पत्ति और प्रकृति को समझे बिना मनुष्य व्यर्थ के कार्यों और प्रयासों में संलग्न रहते हैं। भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य पाप कर्म करता है और निम्न योनियों में जन्म लेता है। कभी-कभी भौतिक सुखों के भोग की प्रवृत्ति वृक्ष के पत्तों की ओर आकर्षित करती है जोकि वेदों में वर्णित धार्मिक अनुष्ठान हैं। इन धार्मिक कार्मकाण्डों में संलग्न होकर मनुष्य केवल कुछ समय के लिए स्वर्ग लोक जाता है और अपने पुण्य कर्म समाप्त होने पर वह पुनः पृथ्वी लोक पर लौट आता है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं-
कृष्ण भूलि सेइ जीव अनादि-बहिर्मुख
अतएव मायातारे देय संसार-दुःख।।
कभु स्वर्गे उठाय, कभु नरके डुबाय
दण्ड्य जाने राजा येन नदीते चुभाय
(चैतन्य चरितामृत, मध्य लीला-20.117-118)
"आत्मा अनन्त काल से भगवान को भुलाए हुए है, इसलिए माया उसे संसार के दुःख भोगने के लिए विवश कर देती है। कभी-कभी यह आत्मा को स्वर्ग लोक देती है और कभी इसे नीचे नरक के लोकों में गिरा देती है। यह प्राचीन काल में राजाओं द्वारा दी जाने वाली यातनाओं के समान है। यातना के रूप में प्राचीन काल में राजा किसी व्यक्ति के सिर को पानी में तब तक डुबाने का ओदश देते थे जब तक कि उसका दम न घुट जाए और फिर उसे कुछ अंतराल के लिए मुक्त कर देते थे। जीवात्मा की स्थिति भी इसी के समान है। इसे स्वर्ग में केवल अस्थायी रूप से राहत मिलती है और फिर पुनः इसे पृथ्वी पर गिरा दिया जाता है।" इस प्रकार से अनन्त जन्म व्यतीत हो जाते हैं। भौतिक सुखों को प्राप्त करने के सभी प्रयासों का परिणाम केवल वृक्ष की जड़ों को और अधिक विकसित करना ही है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष को काटने वाला शस्त्र विरक्ति है। 'असङ्ग' शब्द का अर्थ विरक्ति है और यह जीवात्मा के कष्टों का उपाय है। माया के तीन गुणों से भड़की इच्छाओं का विनाश विरक्ति रूपी शस्त्र से किया जा सकता है। यह शस्त्र इस आत्म ज्ञान से निर्मित होना चाहिए-"मैं शाश्वत जीव हूँ न कि भौतिक शरीर। मैं जिस शाश्वत दिव्य आनन्द को प्राप्त करना चाहता हूँ उन्हें इन भौतिक पदार्थों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। जिन इच्छाओं को मैंने यह सोचकर प्रश्रय दिया कि मैं शरीर हूँ, उन्होंने केवल मुझे जन्म और मृत्यु के चक्र में ही स्थिर रखा है। इस में कोई राहत नहीं है।" जब कोई विरक्ति पश्चात् विकसित करता है तब वृक्ष का विकास अवरूद्ध हो जाता है और यह सूख जाता है। इसके पश्चात हमें इस वृक्ष के आधार को खोजना चाहिए जोकि जड़ों से ऊपर है। यह आधार परमेश्वर है।
जैसा कि श्रीकृष्ण ने पहले कहा था-"मैं ही भौतिक और आध्यात्मिक सृष्टि का स्रोत हूँ और सभी कुछ मुझसे उत्पन्न होता है। जो बुद्धिमान लोग इसे जानते हैं वे पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ मेरी आराधना करते हैं।" (श्लोक 10.8) इस प्रकार वृक्ष के मूल स्रोत को जानने के लिए हमें इस श्लोक में वर्णित पद्धति के अनुसार समर्पण करना होगा-"मैं सब कुछ उन पर छोड़ता हूँ जिनसे यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है।" इस प्रकार से जिस वृक्ष को समझना अत्यंत कठिन था उसे अब इस विधि से समझा जा सकता है।
श्रीकृष्ण ने पहले कहा था-"मेरी दिव्य शक्ति माया को पार करना अत्यंत कठिन है लेकिन जो मेरे शरणागत हो जाते हैं वे इसे सरलता से पार कर लेते हैं।" (श्लोक 7.14) इसलिए परम प्रभु की शरण ग्रहण करने पर यह अश्वत्थ वृक्ष नष्ट हो जाएगा। फिर हम पुनः जन्म लेकर संसार में नहीं आएंगे और मृत्यु के पश्चात् भगवान के दिव्य लोक में जाएंगे। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण यह प्रकट करेंगे कि शरणागति क्यों आवश्यक है?
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा |
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा || 3||
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय: |
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी || 4||
इस संसार में इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का बोध नहीं हो सकता और न ही इसके आदि, अंत और …
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