स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर: |
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु || 45||
स्वे-स्वे-अपने-अपने स्वाभाविक कर्म; कर्मणि-कर्म में; अभिरत:-पूरा करना; संसिद्धिम् पूर्णता को; लभते–प्राप्त करना; नरः-मनुष्य; स्व-कर्म-मनुष्य के निर्धारित कर्त्तव्य; निरतः-संलग्न; सिद्धिम् पूर्णता को; यथा-जैसे; विन्दति–प्राप्त करता है; तत्-वह; शृणु-सुनो।
BG 18.45: अपने स्वाभाविक कर्तव्यों का पालन करने से मनुष्य पूर्णता प्राप्त कर सकता है। अब मुझसे यह सुनो कि निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते हुए मनुष्य कैसे पूर्णता प्राप्त करता है।
स्व-धर्म हमारे गुणों और हमारे जीवन की अवस्थाओं पर आधारित होते हैं। इन्हें सम्पन्न करना यह सिद्ध करता है कि हम अपने शरीर और मन की योग्यताओं का उपयोग रचनात्मक ढंग से करते हैं। यह आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाता है और समाज एवं आत्मा के लिए लाभदायक होता है। चूंकि हमारे कर्त्तव्य हमारे स्वभाव के अनुरूप होते हैं इसलिए इनका निर्वहन करने में हम स्वयं को सहज अनुभव करते हैं। फिर जब हमारी क्षमता बढ़ती है तब स्व-धर्म भी परिवर्तित हो जाता है और हम अगली कक्षा में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार से हम अपने उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन कर उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर: |
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु || 45||
अपने स्वाभाविक कर्तव्यों का पालन करने से मनुष्य पूर्णता प्राप्त कर सकता है। अब मुझसे यह सुनो कि निर्धारित कर्तव्यों …
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