य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् |
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते || 19||
यः-वह जो; एनम् इसे; वेत्ति–जानता है; हन्तारम्-मारने वाला; यः-जो; च-और; एनम्-इसे; मन्यते-सोचता है; हतम्-मरा हुआ; उभौ-दोनों; तौ-वे; न न तो; विजानीतः-जानते हैं; न-न ही; अयम्-यह; हन्ति-मारता है; न-नहीं; हन्यते–मारा जाता है।
BG 2.19: वह जो यह सोंचता है कि आत्मा को मारा जा सकता है या आत्मा मर सकती है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं। वास्तव में आत्मा न तो मरती है और न ही उसे मारा जा सकता है।
मृत्यु का भ्रम हमारे भीतर इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि हम स्वयं को शरीर मानते हैं। रामचरितमानस मे इसे निम्न प्रकार से व्यक्त किया गया है
जौं सपनें सिर काटै कोई।
बिनु जागें न दूरि दुःख होई।।
"यदि हम स्वप्न में यह देखते हैं कि हमारे सिर पर चोट लगी है तब हमें उस समय तक पीड़ा का अनुभव होता है जब तक हम स्वप्नावस्था से जाग नहीं जाते।" स्वप्न में घटित वह घटना एक भ्रम के समान होती है किन्तु हमें तब तक पीड़ा सहन करनी पड़ती है जब तक हम नींद से जाग नहीं जाते और हमारा भ्रम टूट नहीं जाता। इस प्रकार से यह भ्रम होना कि हम शरीर हैं, इसी कारण से हमें मृत्यु से भय लगता है। वे आत्मज्ञानी जिनका शरीर होने का भ्रम समाप्त हो जाता है, वे मृत्यु के भय से मुक्त हो जाते हैं। कोई यह भी कह सकता है कि यदि कोई किसी को मार नहीं सकता तब फिर किसी की हत्या करना दण्डनीय अपराध क्यों कहलाता है। इसका उत्तर यह है कि शरीर आत्मा का वाहन है और किसी भी मनुष्य के वाहन अर्थात् शरीर की हत्या करना हिंसा है जो क्षमा योग्य नहीं है। वेदों में स्पष्ट किया गया है कि 'मा हिंस्यात्सर्वभूतानि' अर्थात् 'किसी की हिंसा मत करो।' वास्तव में वेदों में पशुओं के प्रति हिंसा को भी अपराध माना गया है किन्तु कुछ परिस्थितियों में इस नियम का उल्लंघन करना पड़ता है जब हिंसा करना अनिवार्य हो जाता है।
उदाहरणार्थ जब कोई सर्प किसी को काटने लगता है या घातक हथियार से कोई किसी पर आक्रमण करता है या जब कोई अन्यायपूर्ण ढंग से किसी की जीविका को छीन रहा हो तब ऐसी दशा में आत्मरक्षा के लिए हिंसा को अपनाना वैध माना जाता है। वर्तमान स्थिति में अर्जुन के लिए हिंसा या अहिंसा दोनों में क्या और क्यों उचित है? भगवान श्रीकृष्ण उसे यह भगवद्गीता के आगे आने वाले संवादों के माध्यम से विस्तारपूर्वक समझाएंगे। उनकी व्याख्याओं द्वारा इस विषय पर दिव्य ज्ञान का प्रकाश होगा।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् |
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते || 19||
वह जो यह सोंचता है कि आत्मा को मारा जा सकता है या आत्मा मर सकती है, वे दोनों ही …
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