अर्जुन उवाच |
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव |
स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् || 54||
अर्जुन उवाच-अर्जुन ने कहा; स्थित-प्रज्ञस्य-स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति; का-क्या; भाषा-बोलना; समाधिस्थस्य-दिव्य चेतना में स्थित मनुष्य का; केशव-केशी राक्षस का दमन करने वाले, श्रीकृष्ण; स्थितधी:-प्रबुद्ध व्यक्ति; किम्-क्या; प्रभाषेत बोलता है; किम्-कैसे; आसीत-बैठता है; व्रजेत-चलता है; किम्-कैसे।
BG 2.54: अर्जुन ने कहाः हे केशव! दिव्य चेतना में लीन मनुष्य के क्या लक्षण हैं। वह सिद्ध पुरुष कैसे बोलता है? कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
स्थितप्रज्ञस्य (स्थिर बुद्धियुक्त मनुष्य) और समाधिस्थस्य (दिव्य चेतना में स्थित) की उपाधि महापुरुषों को दी जाती है। श्रीकृष्ण से पूर्ण योग की अवस्था या समाधि के विषय पर उपदेश सुनकर अर्जुन स्वाभाविक प्रश्न पूछता है। वह ऐसी अवस्था वाले सिद्धपुरुष के मन की प्रकृति के संबंध में जानना चाहता है। इसके अतिरिक्त वह यह भी जानना चाहता है कि दिव्य चेतना में स्थित मनुष्य की मानसिकता उसके स्वभाव में कैसे प्रकट होती है। इस श्लोक से आरम्भ करते हुए अर्जुन श्रीकृष्ण से सोलह प्रश्न पूछता है। जिसकी प्रतिक्रिया में श्रीकृष्ण कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, तप और ध्यान इत्यादि के संबंध में गूढ़ रहस्य प्रकट करते हैं।
अर्जुन द्वारा पूछे गए सोलह प्रश्न निम्नवर्णित हैं
1. "दिव्य चेतना में स्थित मनुष्य के क्या लक्षण हैं।" (श्लोक 2.54)
2. “यदि तुम ज्ञान को सकाम कर्मों से श्रेष्ठ मानते हो तब मुझे इस घोर युद्ध में क्यों धकेलना ___चाहते हो।" (श्लोक 3.1)
3. "मनुष्य न चाहकर भी पापकर्मों में क्यों प्रवृत्त हो जाता है? क्या उसे बलपूर्वक पापमयी कर्मों में लगाया जाता है।" (श्लोक 3.36)
4. "आपका जन्म सूर्य से बहुत काल पश्चात् हुआ था, तब फिर मैं यह कैसे समझूं कि आपने उसे इस ज्ञान का उपदेश दिया था।" (श्लोक 4.4)
5. "पहले आप कर्मों का परित्याग करने की अनुशंसा करते हैं और फिर पुनः आप निष्ठापूर्वक श्रद्धाभक्ति के साथ कर्म करने की प्रशंसा करते हैं। कृपया मुझे निश्चयपूर्वक समझाने की कृपा करें कि इन दोनों में से क्या लाभकारी है।" (श्लोक 5.1)
6. "हे कृष्ण। मन चंचल, अशांत, शक्तिशाली और हठी है। मुझे प्रतीत होता है कि वायु की अपेक्षा इसे नियंत्रित करना अत्यंत कठिन है।" (श्लोक 6.33)
7. "उस असफल योगी का भविष्य कैसा है जो प्रारम्भ में श्रद्धापूर्वक भक्तिमार्ग पर चलता है तथा बाद में जिसका मन भगवान से हटकर दुर्वासनाओं में लिप्त हो जाता है और अपने जीवन में भगवतप्राप्ति नहीं कर पाता।" (श्लोक 6.37)
8. "ब्रह्म क्या है और कर्म क्या है? अधिभूत क्या है और अधिदेव कौन है? अधियज्ञ क्या है और यह शरीर में कैसे रहता है? मन को भक्ति में स्थिर रखने वाले योगी मृत्यु के समय आपको कैसे पा लेते हैं।" (श्लोक 8.1-2)
9. "कृपया मुझे अपने दिव्य वैभवों के संबंध में विस्तारपूर्वक समझाएँ जिसके द्वारा आप समस्त संसार में व्याप्त हैं।" (श्लोक 10.16) ।
10. "हे परम पुरुषोत्तम! मेरी इच्छा है कि मैं आपका विश्वरूप देखूं!" (श्लोक 11.3)
11. "मैं जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं, आपकी प्रकृति और कार्य मुझे विस्मित करते हैं।" (श्लोक 11.31)
12. "जो आपकी साकार रूप में भक्ति करते हैं या जो अव्यक्त निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म के रूप में आपकी पूजा करते हैं, इन दोनों में से किसको श्रेष्ठ माना जाए।" (श्लोक 12.1)
13. "मैं प्रकृति और पुरुष (भोक्ता) के बारे में जानना चाहता हूँ। कर्म क्षेत्र क्या है और कर्म क्षेत्र का ज्ञाता कौन है? ज्ञान क्या है और ज्ञान का विषय क्या है।" (श्लोक 13.1)
14. "उस पुरुष के क्या लक्षण हैं जो प्रकृति के तीन गुणों से परे हो चुका है। हे भगवान! उसका आचरण क्या है। वह गुणों के बंधन को कैसे पार कर जाता है।" (श्लोक 14.21)
15. "उन लोगों की स्थिति क्या है जो शास्त्रों के विधि-विधानों की अवहेलना करते हैं किन्तु अपनी इच्छा से श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं।" (श्लोक 17.1)
16. "मैं संन्यास का प्रयोजन जानना चाहता हूँ, यह त्याग या कर्म के फलों का परित्याग करने से कैसे भिन्न है।" (श्लोक 18.1)
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