नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |
न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम् || 66||
न–नहीं; अस्ति-है; बुद्धिः-बुद्धि; अयुक्तस्य-भगवान में स्थित न होना; न-नहीं; च-और; अयुक्तस्य भगवान में स्थित न रहने वाले; भावना-चिन्तन; न नहीं; च-और; अभावयतः-जो स्थिर नहीं है उसके; शान्तिः शान्ति; अशान्तस्य-अशान्त; कुत:-कहाँ है; सुखम्-सुख।
BG 2.66: लेकिन असंयमी व्यक्ति का अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता, न ही उसकी बुद्धि दृढ़ होती है और न ही उसका मन भगवान के चिन्तन में स्थिर हो सकता है। अपने मन को भगवान में स्थिर किये, जिसके बिना शान्ति संभव नहीं और शांति के बिना कोई कैसे सुखी रह सकता है?
यह श्लोक पिछले श्लोक के निष्कर्ष की ही पुष्टि करता है। इससे पहले के श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि "भगवान को जानो और शांति प्राप्त करो" इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'भगवान के बिना शांति संभव नहीं।' जो व्यक्ति मन और इन्द्रियों को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं करता, वह न तो भगवान का चिन्तन कर सकता है और न ही उनकी दिव्य कृपा पा सकता है। दिव्य प्रेमरस का आस्वादन किए बिना सांसारिक ऐश्वर्यों और सुखों का त्याग करना संभव नहीं है और ऐसे लोग भौतिक सुखों के लिए उसी प्रकार से लालायित रहते हैं जिस प्रकार से एक मधुमक्खी के लिए मधुरस का त्याग करना असंभव होता है।
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं भास्वानुद्वेष्यति हसिष्यति पङ्कजश्रीः।
एवं विचिन्तयति कोषगते द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनी गज उज्जहार ।।
(सूक्ति सुधाकर)
उपर्युक्त संस्कृत साहित्य का प्रसिद्ध श्लोक मधुमक्खी की कहानी से संबंधित है। एक मधुमक्खी कमल के फूल पर बैठी थी और उसका मधुरस पी रही थी। ज्यों ही सूर्यास्त होने लगा तब फूलों की पत्तियाँ संकुचित होने लगी लेकिन मधुमक्खी अपनी इन्द्रियों का सुख पाने के लिए इतनी आसक्त थी कि वह उड़ना नहीं चाहती थी। उसने सोंच-"अभी फूल के संकुचित होने में बहुत समय है इसलिए मैं और अधिक मधुरस पी सकती हूँ।" इसी प्रकार से हम भी वृद्धावस्था को देख रहे होते हैं जो कि मृत्यु का स्पष्ट संकेत है किन्तु फिर भी हम मधुमक्खी के समान सांसारिक सुखों में मग्न रहना चाहते हैं। थोड़े ही समय में अंधेरा होने पर फूल संकुचित हो गया और मधुमक्खी उसमें फंस गयी। "उसने सोंचा कोई बात नहीं है, रातभर फूल के भीतर रह लूंगी और कल प्रातः काल में जब पत्तियाँ पुनः खिलेंगी, तब मैं उड़ जाऊंगी।"
"काष्ठ भेदे निपुणोपि संग्रहीकुंठितो भवति पद्मविभेदे" अर्थात् मधुमक्खी में लकड़ी को खोखला करने की शक्ति होती है किन्तु विषय के प्रति आसक्ति होने के कारण वह कमल के फूल की कोमल पत्तियों के भीतर चिपकी रहती है। उसी समय एक हाथी आया और उसने कमल के फूल की टहनी को तोड़ कर निगल लिया। अब मधुमक्खी कमल के फूल के साथ हाथी के पेट में चली गयी। फिर भी वह सोंच रही थी-'मेरा प्रिय कमल का फूल कहीं जा रहा है और मैं भी सहर्ष उसके साथ जा रही हूँ।' इसके पश्चात् वह शीघ्र ही मर गयी। इस प्रकार से हम मनुष्य भी अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने में मग्न रहते हैं और संतों द्वारा भगवान की भक्ति करने के उपदेश पर ध्यान नहीं देते। अंततः काल हमें मृत्यु के रूप में ग्रस लेता है। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो अपनी इन्द्रियों पर संयम नहीं रखते और निरंतर उनकी तृप्ति करने में लगे रहते हैं, वे माया के तीन गुणों के बंधनों मे बंध जाते हैं। भौतिक इच्छाएँ खुजली वाली खाज जैसी हैं जिसमें हम जितना अधिक लिप्त होते हैं उतना ही अधिक हमारा विनाश होता है। इस प्रकार सांसारिक विषय भोगों में लिप्त रहने पर हम कैसे वास्तविक सुख पा सकते हैं?।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |
न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम् || 66||
लेकिन असंयमी व्यक्ति का अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता, न ही उसकी बुद्धि दृढ़ होती है और …
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