ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ् क्षति |
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते || 3||
ज्ञेयः-मानना चाहिएः सः-वह मनुष्य; नित्य-सदैव; संन्यासी-वैराग्य का अभ्यास करने वाला; यः-जो; न कभी नहीं; द्वेष्टि-घृणा करता है; न-न तो; काङ्क्षति-कामना करता है; निर्द्वन्द्वः सभी द्वंदों से मुक्त; हि-निश्चय ही; महाबाहो बलिष्ठ भुजाओं वाला अर्जुन; सुखम्-सरलता से; बन्धात्-बन्धन से; प्रमुच्यते-मुक्त होना।
BG 5.3: वे कर्मयोगी जो न तो कोई कामना करते हैं और न ही किसी से घृणा करते हैं उन्हें नित्य संन्यासी माना जाना चाहिए। हे महाबाहु अर्जुन! सभी प्रकार के द्वन्द्वों से मुक्त होने के कारण वे माया के बंधनों से सरलता से मुक्ति पा लेते हैं।
कर्मयोगी विरक्ति का अभ्यास करते हुए अपने सांसारिक दायित्वों का निरन्तर निर्वहन करते रहते हैं। इसलिए वे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिस्थितियों को भगवान की कृपा के रूप में समभाव से स्वीकार करते हैं। भगवान ने इस सृष्टि की संरचना अति विलक्षणता से की है जिसमें हमें अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए सुख और दुःख दोनों का अनुभव करना आवश्यक है। यदि हम नियमित रूप से जीवन निर्वाह करते हुए अपने मार्ग में आने वाली सभी चुनौतियों को सहन कर प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करते रहते हैं तब संसार हमें उत्तरोत्तर आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
इस दृष्टिकोण को समझने के लिए एक रोचक कथा इस प्रकार से है-एक बार लकड़ी का एक टुकड़ा बढ़ई के पास जाकर कहने लगा-"क्या आप मुझे सुंदर बना सकते हो?" बढ़ई ने कहा-मैं ऐसा करने के लिए तैयार हूँ, क्या तुम भी इसके लिए तैयार हो?" लकड़ी के टुकड़े ने उत्तर दिया "हाँ, मैं भी तैयार हूँ।" बढई अपने औजार निकालकर लकड़ी को थोड़ा छीलने लगा। लकड़ी ने भयभीत होकर कहा-आप क्या कर रहे हो? “कृपया रुको! यह बहुत पीड़ादायक है।" बढ़ई ने कहा-अगर तुम सुन्दर बनना चाहते हो, तब तुम्हें पीड़ा सहन करनी पड़ेगी। लकड़ी के टुकड़े ने कहा "ठीक है। अपना काम करते रहो, किन्तु सहजता से और ध्यानपूर्वक।" कुछ देर बाद लकड़ी ने कहा “आज के लिए बस इतना ही पर्याप्त है, मैं आज और पीड़ा सहन नहीं कर सकती कृपया शेष कार्य कल करना।" बढ़ई अपने काम के प्रति अडिग था और कुछ ही दिनों में लकड़ी एक सुन्दर मूर्ति बन गई और उसे मन्दिर की वेदी में स्थापित कर दिया गया। उसी तरह हमारा हृदय अनन्त जन्मों से सांसारिक पदार्थों में आसक्त रहने के कारण अशुद्ध होता है। यदि हम आंतरिक रूप से पवित्र होना चाहते हैं तब हमें अवश्य ही पीड़ा सहन करनी पड़ेगी और माया के संसार को हमें शुद्ध करने की छूट देनी होगी। इसलिए कर्मयोगी श्रद्धा भक्ति के साथ कर्म करते हैं तथा सुखद और दुःखद परिणामों से विचलित न होकर समता की भावना में लीन रहते हैं और मन को भगवान में अनुरक्त करने का अभ्यास करते रहते हैं।
ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ् क्षति |
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते || 3||
वे कर्मयोगी जो न तो कोई कामना करते हैं और न ही किसी से घृणा करते हैं उन्हें नित्य संन्यासी …
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