जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित: |
शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो: || 7||
जित-आत्मन:-जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली हो। प्रशान्तस्य–शान्ति; परम-आत्मा-परमात्मा; समाहितः-दृढ़ संकल्प से; शीत-सर्दी; उष्ण-गर्मी में; सुख-सुख, दुःखेषु और दु:ख में; तथा भी; मान-सम्मान; अपमानयोः-और अपमान।
BG 6.7: वे योगी जिन्होंने मन पर विजय पा ली है वे शीत-ताप, सुख-दु:ख और मान-अपमान के द्वंद्वों से ऊपर उठ जाते हैं। ऐसे योगी शान्त रहते हैं और भगवान की भक्ति के प्रति उनकी श्रद्धा अटल होती है।
श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय के चौदहवें श्लोक में स्पष्ट किया था कि इन्द्रियों और उसके विषयों के संपर्क से मन शीत और ताप तथा सुख-दु:ख का अनुभव करता है। जब तक मन वश में नहीं होता तब तक मनुष्य इन्द्रिय सुखों के लिए उनके पीछे भागता रहता है और दुःख का अनुभव होने पर पीछे हट जाता है। जो योगी मन पर विजय पा लेता है वह इन क्षणभंगुर सुखों को आत्मा से भिन्न शारीरिक इन्द्रियों की क्रियाशीलता के रूप में देखता है। ऐसे सिद्ध योगी ताप और शीत तथा सुख और दु:ख आदि के दैत से परे रहते हैं। मन दो क्षेत्रों में भ्रमण करता है-एक माया का क्षेत्र और दूसरा भगवान का क्षेत्र। यदि मन संसार के विषयों से ऊपर उठ जाता है तब वह सुगमता से भगवान में तल्लीन हो सकता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण कहते हैं कि सिद्ध योगी का मन समाधि में स्थिर अर्थात् भगवान की गहन साधना में लीन हो जाता है।
जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित: |
शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो: || 7||
वे योगी जिन्होंने मन पर विजय पा ली है वे शीत-ताप, सुख-दु:ख और मान-अपमान के द्वंद्वों से ऊपर उठ जाते …
Sign in to save your favorite verses.
Sign In
जिस ज्ञान की आप खोज कर रहे हैं, सीधे वहाँ पहुँचें
पवित्र भगवद्गीता के शाश्वत प्रेरणादायक ज्ञान से अपना दिन शुरू करें, जो सीधे आपके ईमेल पर पहुँचे!
Welcome 🙏
Here's what you've unlocked
Bookmarks
Save verses for quick return
Notes
Write your own reflections
Progress
Track all 18 chapters
Verse of the Day
A new shloka in your inbox daily