चतुर्विधा: भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन |
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ || 16||
चतुः विधाः-चार प्रकार के; भजन्ते-सेवा करते हैं; माम् मेरी; जनाः-व्यक्ति; सुकृतिनः-वे जो पुण्यात्मा हैं; अर्जुन-अर्जुन; आर्त:-पीड़ित; जिज्ञासुः-ज्ञान अर्जन करने के अभिलाषी; अर्थ-अर्थी-लाभ की इच्छा रखने वाले; ज्ञानी-वे जो ज्ञान में स्थित रहते हैं; च-भी; भरत-ऋषभ-भरतश्रेष्ठ, अर्जुन।।
BG 7.16: हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पवित्र लोग मेरी भक्ति में लीन रहते हैं: आर्त अर्थात् पीड़ित, ज्ञान की जिज्ञासा रखने वाले जिज्ञासु, संसार के स्वामित्व की अभिलाषा रखने वाले अर्थार्थी और जो परमज्ञान में स्थित ज्ञानी हैं।
उन मनुष्यों की जो भगवान की शरणागति नहीं करना चाहते, की व्याख्या करने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण अब भगवान की शरण ग्रहण करने वाले मनुष्यों की श्रेणियों को व्यक्त करते हैं-
1. आर्तः कुछ मनुष्यों के लिए जब सांसारिक दु:खों का पात्र अत्यधिक भर जाता है तब वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सांसारिक पदार्थों के पीछे भागना व्यर्थ है और भगवान की शरण ग्रहण करना ही उत्तम है। इसप्रकार जब वे देखते हैं कि सांसारिक आश्रय उनकी रक्षा करने में असमर्थ हैं तब वे भगवान की ओर मुड़ते हैं।
इस प्रकार के समर्पण का एक सटीक उदाहरण द्रौपदी का श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण है। जब कौरवों की सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र किया जा रहा था तब सर्वप्रथम उसने अपनी रक्षा हेतु अपने पतियों के नाम लिए। जब वे चुप रहे तब उसने सभा में उपस्थित सम्मानित वयोवृद्ध द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म पितामह और विदुर पर भरोसा करते हुए उनसे अपनी रक्षा हेतु सहायता माँगी। किन्तु जब वे भी मौन रहकर उसकी रक्षा न कर सके, तब फिर द्रौपदी ने साड़ी को अपने दाँतो के बीच फँसा दिया। उस समय तक भी श्रीकृष्ण द्रौपदी की रक्षा के लिए नहीं आए। अंत में जब दुःशासन ने एक झटके के साथ उसकी साड़ी को खींचा तो साड़ी दाँतो की पकड़ से छूट गयी। ऐसी दशा में जब उसे अपनी रक्षा हेतु न तो अपने पतियों पर, न किसी अन्य पर तथा न ही अपनी शक्ति पर विश्वास रहा तब उसने अपनी रक्षा के लिए श्रीकृष्ण के पूर्ण शरणागत होने का निश्चय किया तब भगवान ने उसकी पूरी रक्षा की। वे वहाँ प्रकट होकर उसकी साड़ी का विस्तार करते रहे। दुःशासन साड़ी खींचता गया किन्तु इसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ा और वह द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में विफल रहा।
2. ज्ञान प्राप्त करने वाले जिज्ञासुः भगवान को जानने की अपनी इच्छा के परिणामस्वरूप कुछ जिज्ञासु मनुष्य भगवान की शरण में जाते हैं। उन्होंने आध्यात्मिक जगत में परम आनन्द की खोज करने वाले महापुरुषों के संबंध में सुना होता है और यह सब उन्हें भगवान के बारे में जानने के लिए उत्साहित करता है। इसलिए वे अपनी जिज्ञासा को संतुष्ट करने के लिए भगवान की ओर अग्रसर होते हैं।
3. सांसारिक संपत्ति की अभिलाषा रखने वाले अथार्थीः अन्य प्रकार के मनुष्य जिन्हें यह स्पष्ट है कि उन्हें क्या चाहिए और वे यह समझते है कि केवल भगवान ही उन्हें मनोवांछित पदार्थ प्रदान कर सकते हैं, वे कामनाओं की पूर्ति हेतु भगवान की शरण में जाते हैं। ध्रुव ने अपने पिता राजा उत्तानपाद से अधिक शक्तिशाली होने की कामना के साथ भगवान की भक्ति आरम्भ की थी किन्तु जब उसकी भक्ति परिपक्व हो गयी और भगवान ने उसे दर्शन दिए तब उसने अनुभव किया कि उसने जो कामना की थी वह परमात्मा के दिव्य प्रेम रुपी अमूल्य रत्न की तुलना में काँच के टूटे हुए टुकड़े के समान थी तब फिर उसने भगवान से निष्काम, नि:स्वार्थ भक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की।
4. ज्ञान में स्थित ज्ञानी मनुष्यः अन्ततः कुछ जीवात्माओं को यह बोध हो जाता है कि वे भगवान के अणु अंश हैं और उनका परम धर्म भगवान से प्रेम और उनकी सेवा करना ही है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये चौथी श्रेणी वाले ही वे मनुष्य हैं जो भगवान की भक्ति में तल्लीन रहते हैं।
चतुर्विधा: भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन |
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ || 16||
हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पवित्र लोग मेरी भक्ति में लीन रहते हैं: आर्त अर्थात् पीड़ित, ज्ञान की जिज्ञासा रखने …
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