Bhagavad Gita: Chapter 13, Verse 13

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते |
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || 13||

ज्ञेयम्-जानने योग्य; यत्-जो; तत्-वह; प्रवक्ष्यामि-अब मैं प्रकट करूंगा; यत्-जिसे; ज्ञात्वा-जानकर; अमृतम्-अमरत्व को; अश्नुते–प्राप्त होता है; अनादि-आदि रहित; मत्-परम्-मेरे अधीन; ब्रह्म-ब्रह्म; न-न तो; सत्-अस्तित्व; तत्-वह; न-न तो; असत्-अस्तित्व होता है, प्रभाव; उच्यते-कहा जाता है।

Translation

BG 13.13: अब मैं तुम्हें वह बताऊंगा जो जानने योग्य है और जिसे जान लेने के पश्चात् जीव अमरत्व प्राप्त कर लेता है। यह जेय तत्त्व अनादि ब्रह्म है जो सत् और असत् से परे है।

Commentary

दिन और रात एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक का दूसरे के बिना कोई अस्तित्त्व नहीं होता। इसलिए जहाँ कोई रात्रि नहीं है वहाँ दिन भी नहीं हो सकता। इस कारण वहाँ केवल शाश्वत प्रकाश होगा। समान रूप से ब्रह्म के प्रकरण में 'सत्' शब्द पर्याप्त नहीं है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्रह्म सत् और असत् संबंधी शब्दों से परे है। ब्रह्म अपने निराकार और निर्गुण स्वरूप में ही ज्ञानियों की आराधना का केंद्र होता है। उनका साकार स्वरूप भक्तों की आराधना का आधार होता है। शरीर के भीतर निवास करने वाले स्वरूप को परमात्मा कहा जाता है। ब्रह्म की ये तीनों अभिव्यक्तियाँ एक ही हैं। 14वें अध्याय के 27वें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है-

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च

 "मैं ही निराकार ब्रह्म का आधार हूँ।" इस प्रकार से निराकार ब्रह्म और भगवान का साकार रूप दोनों एक ही परमात्मा के दो स्वरूप हैं। दोनों सर्वत्र व्याप्त हैं और इसलिए इन दोनों को सर्वव्यापक कहा जा सकता है। इनका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण भगवान में प्रकट होने वाले विरोधाभासी गुणों की व्याख्या करते हैं।

Swami Mukundananda

13. क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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