Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 11

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥11॥

देवान्–स्वर्ग के देवताओं को; भावयता–प्रसन्न होंगे; अनेन–इन यज्ञों से; ते–वे; देवाः-स्वर्ग के देवता; भावयन्तु-प्रसन्न होंगे; वः-तुमको; परस्परम–एक दूसरे को; भावयन्तः-एक दूसरे को प्रसन्न करते हुए; श्रेयः-समृद्ध; परम-सर्वोच्च; अवाप्स्यथ–प्राप्त करोगे।

Translation

BG 3.11: तुम्हारे द्वारा सम्पन्न किए गए यज्ञों से देवता प्रसन्न होंगे और मनष्यों और देवताओं के मध्य सहयोग के परिणामस्वरूप सभी को सुख समृद्धि प्राप्त होगी।

Commentary

स्वर्ग के देवता अधिकारिक रूप से ब्रह्मांड के प्रशासन का संचालन करते हैं। परमपिता परमात्मा संसार की शासन व्यवस्था के नियंत्रण और संचालन संबंधी अपने कार्य उनके माध्यम से करते हैं। ये देवता भौतिक ब्रह्मांड के उच्च लोक जिसे स्वर्ग या देवलोक कहा जाता है, में निवास करते हैं। देवतागण भगवान नहीं हैं अपितु वे भी हमारे जैसी आत्माएँ हैं। उन्हें संसार के संचालन से संबंधित दायित्वों का निर्वाहन करने हेतु पद सौंपे गये हैं। अपने देश की संघीय सरकार की शासन व्यवस्था पर ध्यान दें जहाँ राज्य सचिव, राजस्व का सचिव, रक्षा सचिव, अटारनी जनरल और अन्य पद हैं। इन पदों पर जिन लोगों का चयन होता है, वे निश्चित समयावधि तक अपने पद पर बने रहते हैं। समयावधि समाप्त होने पर या सत्ता हस्तान्तरण होने पर सभी पदों पर नियुक्त लोगों को हटा दिया जाता है। समान रूप से संसार के प्रशासन संबंधी कार्यों का संचालन करने के लिए भी कुछ पद जैसे अग्निदेव (अग्नि का देवता), वायु देव (वायु का देवता), वरुणदेव (समुद्र का देवता), इन्द्रदेव (स्वर्ग के देवताओं का राजा) आदि पदों का सृजन किया गया है। पूर्वजन्म के संस्कारों, गुणों और पाप-पुण्यमय कर्मों के आधार पर जीवात्मा को इन पदों पर नियुक्त किया जाता है। ये पद दीर्घकाल के लिए निश्चित होते हैं और इन पदों पर आसीन लोग ब्रह्मांड के शासन का संचालन करते हैं। ये सब देवता हैं। वेदों में स्वर्ग के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के कर्मकाण्डों एवं धार्मिक विधि-विधानों का उल्लेख किया गया है और इनके बदले में देवता लौकिक सुख समृद्धि प्रदान करते हैं। जब हम अपने यज्ञ कर्म भगवान की संतुष्टि के लिए करते हैं तब स्वर्ग के देवता भी स्वतः संतुष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार हम किसी वृक्ष की जड़ को पानी देते है तब वह स्वतः उसके पुष्पों, फलों, पत्तियों शाखाओं और लताओं तक पहुँच जाता है। स्कन्ध पुराण में वर्णन है:

अर्चिते देव देवेशे शङ्ख चक्र गदाधरे।

अर्चिताः सर्वे देवाः स्युर्यतः सर्व गतो हरिः।।

 "विष्णु भगवान की उपासना करने से सभी देवताओं की स्वतः उपासना हो जाती है क्योंकि वे अपनी शक्तियाँ उनसे प्राप्त करते हैं।" इसलिए यज्ञ कर्म के निष्पादन से देवतागण वास्तव में प्रसन्न होते हैं और वे कृपापूर्वक भौतिक प्रकृति के उपादानों का सामंजस्य करते हुए मानव समाज के लिए सुख समृद्धि की व्यवस्था करते हैं।