Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 12

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥12॥

काड्.क्षन्तः-इच्छा करते हुए; कर्मणाम्-भौतिक कर्म; सिद्धिम् सफलता; जयन्ते-पूजा; इह-इस संसार में; देवताः-स्वर्ग के देवता; क्षिप्रम्-शीघ्र ही; हि-निश्चय ही; मानुषे–मानव समाज में; लोके-इस संसार में; सिद्धिः-सफलता; भवति–प्राप्त होती है; कर्मजा–भौतिक कर्मों से।

Translation

BG 4.12: इस संसार में जो लोग सकाम कर्मों में सफलता चाहते हैं वे लोग स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं क्योंकि सकाम कर्मों का फल शीघ्र प्राप्त होता है।

Commentary

जो लोग सांसारिक पदार्थों को प्राप्त करना चाहते हैं वे स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं और उनसे वरदान प्राप्त करते हैं। देवताओं द्वारा प्रदान किए जाने वाले वरदान भौतिक और अस्थायी होते हैं। क्योंकि देवता भी इन्हें केवल भगवान की शक्ति प्राप्त होने पर प्रदान कर सकते हैं। इस संबंध में एक ज्ञानप्रद सुन्दर कथा इस प्रकार से है-

संत फरीद भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध शक्तिशाली बादशाह अकबर के दरबार में गए। वह जनता के दरबार में बैठकर बादशाह अकबर की प्रतीक्षा करने लगे जबकि अकबर दूसरे कमरे में प्रार्थना कर रहा था। संत फरीद ने उस कमरे में झांक कर देखना चाहा कि वहाँ क्या हो रहा था। वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि अकबर भगवान से अधिक शक्तिशाली सेना, धन से भरी तिजोरियाँ और युद्ध में विजय पाने की प्रार्थना कर रहा था। बादशाह को आकुल किए बिना बाबा फरीद राज दरबार में लौट आए। अकबर अपनी प्रार्थना पूरी करने के पश्चात जनता के दरबार में आया और उन्होंने संत फरीद के दर्शन किए। अकबर ने संत फरीद से पूछा कि क्या उन्हें किसी चीज की आवश्यकता है। संत फरीद ने उत्तर दिया, "मैं सम्राट से अपने आश्रम के लिए आवश्यक वस्तुएँ मांगने आया था किन्तु मैंने यह पाया कि बादशाह स्वयं भगवान से भीख मांग रहा है, तब फिर मैंने सोचा कि उससे कुछ मांगने की अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप से भगवान से ही क्यों न मांगू?" स्वर्ग के देवता केवल वही वरदान दे सकते हैं जो उन्हें भगवान की शक्तियों द्वारा प्राप्त होते हैं। संकीर्ण बुद्धि वाले लोग देवताओं की शरण में जाते हैं किन्तु ज्ञानी पुरुष समझते हैं कि इन मध्यस्थों से उनका मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता इसलिए वे अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति हेतु भगवान की शरण ग्रहण करते हैं। विभिन्न प्रकार के लोगों की न्यूनतम और अधिकतम अभिलाषाएँ होती हैं। श्रीकृष्ण अब आगे चार श्रेणी के गुणों और कार्यों का उल्लेख करेंगे।