सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय: |
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् || 56||
सर्व-सब; कर्माणि-कर्म; अपि-यद्यपि; सदा-सदैव; कुर्वाणः-निष्पादित करते हुए; मत्-व्यपाश्रयः-मेरी पूर्ण शरणागति में; मत्-प्रसादात्-मेरी कृपा से; अवाप्नोति–प्राप्त करता है; शाश्वतम्-नित्य; पदम्-धाम; अव्ययम्-अविनाशी।
BG 18.56: मेरे भक्त सभी प्रकार के कार्यों को करते हुए भी मेरी पूर्ण शरण ग्रहण करते हैं। तथा वे मेरी कृपा से मेरा नित्य एवं अविनाशी धाम प्राप्त करते हैं।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने यह व्याख्या की थी कि भक्ति द्वारा भक्त उन्हें प्राप्त करते हैं। वे सभी में भगवान के संबंध को स्वीकार करते हैं। वे भौतिक संपत्तियों को भगवान की संपत्ति के रूप में देखते हैं। वे सभी जीवों को भगवान के अभिन्न अंग के रूप में देखते हैं और स्वयं को भगवान का तुच्छ सेवक समझते हैं। इस दिव्य चेतना में वे कर्मों का त्याग नहीं करते बल्कि वे कर्ता और कर्म का भोक्ता होने के अहम् का त्याग करते हैं। वे सभी कार्यों को परमेश्वर की सेवा के रूप में देखते हैं और उनके सम्पादन के लिए भगवान का आश्रय लेते हैं। तथा अपने शरीर का त्याग करके वे भगवान के दिव्य लोक में जाते हैं। जिस प्रकार भौतिक क्षेत्र माया शक्ति से निर्मित होता है, उसी प्रकार से आध्यात्मिक क्षेत्र योगमाया शक्ति से बना है। इसलिए यह सभी प्रकार के मायिक दोषों से मुक्त होता है। यह सत्, चित् और आनंद होता है अर्थात् नित्य या अविनाशी, सर्वज्ञ और आनन्द से परिपूर्ण होता है। अपने दिव्य धाम के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने 15वें अध्याय के छठे श्लोक में कहा था, "न तो सूर्य, न चन्द्रमा और न ही अग्नि मेरे दिव्य लोक को प्रकाशित कर सकती है। एक बार वहाँ जाने के पश्चात् कोई पुनः संसार में लौट कर नहीं आता।"
आध्यात्मिक क्षेत्र में भगवान के विभिन्न स्वरूपों के अपने निजी लोक हैं जहाँ वे अपने भक्तों के साथ नित्य मधुर लीलाएँ करते हैं। वे जो उनकी नि:स्वार्थ सेवा करते हैं, वे अपने आराध्य भगवान के स्वरूप वाले लोक में जाते हैं। इस प्रकार से भगवान श्रीकृष्ण के भक्त गोलोक को जाते हैं। विष्णु भगवान के भक्त वैकुण्ठ लोक, भगवान श्रीराम के भक्त साकेत लोक, भगवान शिव की आराधना करने वाले शिव लोक और माता दुर्गा के भक्त देवी लोक में जाते हैं। वे भक्त जो भगवान को प्राप्त कर उनके दिव्य लोकों में प्रवेश करते हैं वे उनकी ऐसी दिव्य लीलाओं में भाग लेते हैं।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय: |
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् || 56||
मेरे भक्त सभी प्रकार के कार्यों को करते हुए भी मेरी पूर्ण शरण ग्रहण करते हैं। तथा वे मेरी कृपा …
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