अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे |
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके || 18||
अव्यक्तात्-अव्यक्त अवस्था से; व्यक्तयः-व्यक्तावस्थाः सर्वाः-सारेः प्रभवन्ति–प्रकट होते हैं; अहः-आगमे ब्रह्मा के दिन का शुभारम्भ; रात्रि-आगमे रात्रि होने पर; प्रलीयन्ते-लीन हो जाते हैं; तत्र-उसमें; एव-निश्चय ही; अव्यक्त-अप्रकट; अव्यक्त-संज्ञके-अव्यक्त कहा जाने वाला।
BG 8.18: ब्रह्मा के दिन के आरंभ में सभी जीव अव्यक्त अवस्था से व्यक्त होते हैं और रात्रि होने पर पुनः सभी जीव अव्यक्त अवस्था में लीन हो जाते हैं।
ब्रह्माण्ड में विभिन्न लोकों के सृजन, स्थिति और प्रलय के चक्रों की पुनरावृति होती रहती है। ब्रह्मा के दिन की समाप्ति पर जो 4,3,20,000,000 वर्षों के बराबर है, महर् लोक तक की ग्रह प्रणालियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इसे नैमित्तिक प्रलय अर्थात् आंशिक प्रलय कहा जाता है। श्रीमद्भागवतम् में शुकदेव जी परीक्षित को अवगत कराते हैं कि जिस प्रकार से बालक दिन में खिलौने से संरचनाएँ बनाता है और उन्हें सोने से पहले नष्ट कर देता है। उसी प्रकार से ब्रह्मा दिन में अपनी जागृत अवस्था में ग्रह प्रणालियों की रचना करते हैं और रात्रि में सोने से पूर्व उन्हें नष्ट कर देते हैं।
ब्रह्मा के जीवन के 100 वर्षों के अन्त में संपूर्ण ब्रह्माण्ड का संहार हो जाता है। उस समय समस्त भौतिक सृष्टि का अंत हो जाता है। पंच महाभूतों का पंच तन्मात्राओं में विलय और पंच तन्मात्राओं का अहंकार और अहंकार का विलय महान् में तथा महान् का विलय प्रकृति में हो जाता है। प्रकृति भौतिक शक्ति माया का सूक्ष्म रूप है। तब माया अपनी मौलिक अवस्था में महा विष्णु परमात्मा के शरीर में जाकर स्थित हो जाती है। इसे प्रकृति प्रलय या महाप्रलय कहते हैं। जब महा विष्णु पुनः सृष्टि करने की इच्छा करते हैं तब वे प्रकृति के रूप में मायाशक्ति पर दृष्टि डालते हैं और वह केवल उनके दृष्टि डालने से विकसित होती है। प्रकृति से महान् और महान् से अहंकार उत्पन्न होता है। अहंकार से पंचतन्मात्राएँ और पंचतन्मात्राओं से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार से अनन्त ब्रह्माण्डों की सृष्टि होती हैं। आज के युग के वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार आकाशगंगा में 100 करोड़ तारे हैं। एक आकाशगंगा के समान ब्रह्माण्ड में 1 करोड़ तारा समूह हैं। वेदों के अनुसार हमारे ब्रह्माण्ड के समान विभिन्न आकार के अनन्त ब्रह्माण्ड अस्तित्व में हैं। हर समय जब महाविष्णु श्वास लेते हैं तब उनके शरीर के छिद्रों से असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट होते हैं और जब वे श्वास बाहर छोड़ते हैं तब सभी ब्रह्माण्डों का संहार हो जाता है। इस प्रकार से ब्रह्मा के 100 वर्षों का जीवन महाविष्णु की एक श्वास के बराबर है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड का एक ब्रह्मा, विष्णु और शंकर होता है। इस प्रकार असंख्य ब्रह्माण्डों में असंख्य ब्रह्मा, विष्णु और शंकर हैं। सभी ब्रह्माण्डों के समस्त विष्णु, महाविष्णु का विस्तार हैं।
अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे |
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके || 18||
ब्रह्मा के दिन के आरंभ में सभी जीव अव्यक्त अवस्था से व्यक्त होते हैं और रात्रि होने पर पुनः सभी …
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