Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 5

श्रीभगवानुवाच।
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥5॥

श्री-भगवान् उवाच-परम् प्रभु ने कहा; बहूनि–अनेक; मे–मेरे; व्यतीतानि-व्यतीत हो चुके; जन्मानि-जन्म; तव-तुम्हारे; च-और; अर्जुन-अर्जुन; तानि-उन; अहम्-मैं जानता हूँ; सर्वाणि-सभी जन्मों को; न-नहीं; त्वम्-तुम; वेत्थ-जानते हो; परन्तप-शत्रुओं का दमन करने वाला, अर्जुन।

Translation

BG 4.5: तुम्हारे और मेरे अनन्त जन्म हो चुके हैं किन्तु हे परन्तप! तुम उन्हें भूल चुके हो जबकि मुझे उन सबका स्मरण है।

Commentary

 श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे अर्जुन के समक्ष एक मनुष्य के रूप में खड़े हैं केवल इस कारण से उनकी तुलना मानव मात्र से नहीं करनी चाहिए। किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष कारागार को देखने का निर्णय लेता है और यदि हम उसे कारागार में खड़ा पाते हैं तब हमें भ्रमित होकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि वह भी एक बन्दी है। हम जानते हैं वह केवल कारागार का निरीक्षण करने के प्रयोजन से वहाँ आया है। इसी प्रकार से भगवान भी कई बार अवतार लेकर मायाबद्ध संसार में प्रकट होते हैं किन्तु वह अपने दिव्य गुणों और शक्तियों को कभी नहीं त्यागते। 

इस श्लोक पर अपनी टीका प्रस्तुत करते हुए शंकराचार्य कहते हैं- “या वासुदेवेअनीश्वरासर्वज्ञाननान्षणम मूर्खाणां तां परिहरन् श्रीभगवान् उवाच।" (शारीरिक भाष्य श्लोक 4.5) अर्थात "श्रीकृष्ण के मुख से उच्चारित इस श्लोक द्वारा उन मूर्ख लोगों की भर्त्सना की गयी है जो उन्हें भगवान स्वीकार करने में संदेह करते हैं।" ये अविश्वासी नास्तिक लोग यह तर्क देते हैं कि श्रीकृष्ण ने भी उन सबके समान जन्म लिया था और उनके समान भोजन किया एवं जल आदि ग्रहण किया और निद्रा लेने आदि जैसे कार्य किए इसलिए वे भगवान नहीं हो सकते। यहाँ इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण जीवात्मा और भगवान के बीच भेद को समझाते हुए कहते हैं कि यद्यपि वे इस संसार में अनन्त बार अवतार लेते हैं तथापि वे सदैव सर्वज्ञ रहते हैं न कि जीवात्मा के समान जिसका ज्ञान सीमित होता है। 

जीवात्मा और परमात्मा में कई प्रकार की समानता होती है, जैसे दोनों सत्-चित्-आनन्द (नित्य, चेतन और आनन्द) हैं फिर भी दोनों में अनेकों भेद हैं। भगवान सर्वव्यापक हैं किन्तु आत्मा केवल मनुष्य के शरीर में व्याप्त रहती है। भगवान सर्वशक्तिमान हैं जबकि आत्मा में भगवान की कृपा के बिना स्वयं को माया से मुक्त करवाने की शक्ति भी नहीं होती। भगवान सृष्टि के नियमों के निर्माता हैं जबकि आत्मा इन नियमों के अधीन है भगवान समस्त सृष्टि के नियन्ता हैं जबकि आत्मा उनके नियंत्रण में रहती है, भगवान सर्वज्ञ हैं और जीवात्मा को किसी एक विषय का भी पूर्ण ज्ञान नहीं होता।

 श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस श्लोक में 'परन्तप' कह कर संबोधित किया है जिसका अर्थ 'शत्रुओं का दमनकर्ता' है। वे कहते हैं, "अर्जुन तुम पराक्रमी योद्धा हो, तुमने कई शक्तिशाली शत्रुओं का वध किया है। अब तुम इस संदेह को जो तुम्हारे मस्तिष्क में प्रविष्ट हो गया है, के समक्ष अपनी पराजय स्वीकार न करो। ज्ञान की जो खड्ग मैं तुम्हे दे रहा हूँ, इससे अपने शत्रुओं का वध करो और ज्ञान में स्थित हो जाओ।"