Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 4

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥4॥

न-नहीं; कर्मणाम् कर्मों के; अनारम्भात्-विमुख रहकर; नैष्कर्म्यम्-कर्म-फलों से मुक्ति; पुरुषः-मनुष्य; अष्नुते–प्राप्त करता है; न-नहीं; च-और; संन्यसनात्-त्याग से; एव-केवल; सिद्धिम् सफलता; समधि-गच्छति–पा लेता है।

Translation

BG 3.4: न तो कोई केवल कर्म से विमुख रहकर कमर्फल से मुक्ति पा सकता है और न केवल शारीरिक संन्यास लेकर ज्ञान में सिद्धावस्था प्राप्त कर सकता है।

Commentary

 इस श्लोक की प्रथम पंक्ति कर्मयोगी, कर्मयोग के अनुयायियों और दूसरी पंक्ति सांख्य योगी, ज्ञान योग के अनुयायियों के सम्बन्ध में है। प्रथम पंक्ति में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कार्य के प्रति केवल उदासीन रहने से कार्मिक प्रतिक्रियाओं से मुक्ति की अवस्था प्राप्त नहीं होती। मन निरन्तर फलप्राप्ति का चिन्तन करता रहता है और क्योंकि मानसिक कार्य भी कर्म का ही रूप है इसलिए यह भी शारीरिक कार्य के समान मनुष्य को कर्म के बंधनो में बांधता है। सच्चे कर्मयोगी को कर्मफलों की आसक्ति से रहित होकर जीवन निर्वाह करना अवश्य सीखना चाहिए। इसके लिए बौद्धिक ज्ञान को उन्नत करना आवश्यक होता है। इसलिए कर्मयोग में सफलता पाने के लिए तत्त्वज्ञान भी अनिवार्य है। दूसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सांख्य योगी केवल संसार से संन्यास लेकर और संन्यासी बनकर ज्ञानोदय की अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता। कोई भी मनुष्य इंद्रियों के विषयों के भोगों का परित्याग कर सकता है। किन्तु जब तक मन अशुद्ध रहता है तब तक वास्तविक ज्ञान का उदय नहीं होता। मन की प्रवृत्ति पिछले विचारों की पुनरावृत्ति करना है। ऐसी पुनरावृत्ति मन के भीतर एक कड़ी का रूप ले लेती है और साथ में नए विचार भी निर्बाध रूप से समान दिशा में उमड़ते रहते हैं। अपनी पुरानी प्रवृत्तियों के कारण लौकिक चिन्तन से मन चिन्ता, तनाव, भय, घृणा, शत्रुता आसक्ति और सांसारिक आवेगों के समस्त रागों की ओर भागता रहता है। इस प्रकार केवल भौतिक रूप से संसार से संन्यास लेने से अशुद्ध अन्तःकरण में वास्तविक ज्ञान प्रकट नहीं होगा। यह उपयुक्त कर्म से युक्त होना चाहिए जो मन और बुद्धि को शुद्ध करता है। इस प्रकार से सांख्य योग में भी सफलता के लिए कर्म करना अनिवार्य है। यह कहा जाता है कि तत्त्वज्ञान के बिना भक्ति भावनात्मक होती है और बिना भक्ति के तत्त्वज्ञान बुद्धि की कल्पना मात्र है। कर्मयोग और सांख्य योग दोनों के लिए कर्म और ज्ञान अनिवार्य हैं। यह केवल इनका समानुपात है जो विविध प्रकार से इन दो मार्गों के बीच भेद उत्पन्न करता है।